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    September 04, 2025

    पीलिया रिपोर्ट में गड़बड़ी से हंगामा, गुस्साए परिजनों ने लैब कर्मचारी को जड़ा थप्पड़...

    शहर के राजीव गांधी शिशु चिकित्सालय के बाहर गुरुवार शाम उस समय हंगामा खड़ा हो गया जब 5 दिन के एक मासूम बच्चे की पीलिया रिपोर्ट में भारी अंतर सामने आया। परिजनों ने आरोप लगाया कि सरकारी डॉक्टर और प्राइवेट लैब मिलीभगत से मरीजों को गलत दिशा में भेज रहे हैं। इसी गुस्से में परिजनों ने क्योरवेल लैब के एक कर्मचारी को थप्पड़ जड़ दिया और वहां जमकर हंगामा किया।

    मामला उस समय शुरू हुआ जब बच्चे को टीका लगवाने के लिए राजीव गांधी शिशु चिकित्सालय लाया गया। यहां डॉक्टर महेश शर्मा ने बच्चे की ब्लड जांच लिखी और उसे अस्पताल की सुविधा के बजाय पास स्थित प्राइवेट क्योरवेल लैब से कराने को कहा। लैब ने जांच के लिए 400 रुपये लिए और रिपोर्ट में पीलिया का स्तर 29.99 बताया। यह रिपोर्ट देखकर डॉक्टर ने तुरंत बच्चे को जयपुर रेफर कर दिया और परिजनों को कुछ निजी डॉक्टरों के नाम भी दिए। परिजनों के अनुसार, डॉक्टर ने यहां तक कहा कि “उन डॉक्टरों को मेरा नाम बता देना।”

    बच्चे के चाचा विश्वेंद्र चौधरी ने बताया कि उनके भाई पुष्पेंद्र चौधरी आर्मी में जवान हैं और उनकी पत्नी की डिलीवरी हाल ही में ईएसआईसी अस्पताल (MIA) में हुई थी। रिपोर्ट पर भरोसा करते हुए वे घबराए और तुरंत बच्चे को बिलाल अस्पताल लेकर पहुंचे। यहां दोबारा जांच हुई तो पीलिया का स्तर सिर्फ 20.23 पाया गया। अस्पताल के डॉक्टरों ने कहा कि बच्चे का इलाज अलवर में ही हो सकता है, जयपुर ले जाने की जरूरत नहीं है।

    रिपोर्ट में इतने बड़े अंतर ने परिजनों का भरोसा तोड़ दिया। उन्हें संदेह हुआ कि जानबूझकर गलत रिपोर्ट बनाकर उन्हें डराया गया और जयपुर भेजने की कोशिश की गई ताकि निजी अस्पतालों और डॉक्टरों को फायदा मिल सके। गुस्से में परिजनों ने शाम को क्योरवेल लैब पर धावा बोल दिया। एक कर्मचारी को थप्पड़ मारा गया और लैब का शटर भी गिरा दिया गया। मौके पर काफी देर तक हंगामा होता रहा।

    परिजनों का आरोप है कि सरकारी डॉक्टर मुफ्त जांच सुविधा उपलब्ध होने के बावजूद मरीजों को प्राइवेट लैब में भेजते हैं। इसका सीधा मतलब है कि डॉक्टर और प्राइवेट लैब के बीच सांठगांठ है। जांच न केवल महंगी कराई जाती है बल्कि गलत रिपोर्ट देकर मरीजों को डराया और प्राइवेट अस्पतालों की ओर मोड़ा जाता है। यह गरीब और मध्यम वर्ग के मरीजों के लिए भारी बोझ साबित हो रहा है।

    इस घटना के बाद स्थानीय लोगों में आक्रोश फैल गया। आसपास मौजूद लोगों का कहना था कि यह कोई पहला मामला नहीं है। कई बार देखा गया है कि डॉक्टर मरीजों को बाहर की लैब या निजी डॉक्टरों के पास भेजते हैं, जबकि वही सुविधाएं सरकारी अस्पतालों में मुफ्त उपलब्ध हैं। सवाल यह भी उठता है कि जब सरकारी अस्पतालों में पीलिया की जांच की व्यवस्था है, तो बाहर भेजने की क्या मजबूरी थी?

    इस पूरे प्रकरण ने स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। परिजनों का आरोप है कि यह एक संगठित नेटवर्क है जिसमें मरीजों को डराकर और गुमराह करके निजी अस्पतालों के हवाले किया जाता है। इससे न सिर्फ आर्थिक नुकसान होता है बल्कि मरीज की जान भी खतरे में पड़ सकती है।

    लोगों का कहना है कि स्वास्थ्य विभाग को इस मामले की निष्पक्ष जांच करनी चाहिए। यदि डॉक्टर और प्राइवेट लैब की मिलीभगत साबित होती है तो कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए ताकि भविष्य में कोई भी मासूम और उसका परिवार इस तरह की लापरवाही और धोखाधड़ी का शिकार न हो।

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