साल 2019 के आखिर में शुरू हुई कोरोना महामारी ने पूरी दुनिया को गंभीर स्वास्थ्य संकट में डाल दिया था। करोड़ों लोग संक्रमण की चपेट में आए और बड़ी संख्या में जानें गईं। हालांकि समय के साथ कोरोना का प्रभाव कम हो गया, लेकिन अब वैज्ञानिक और डॉक्टर एक नए खतरे को लेकर गंभीर चिंता जता रहे हैं।
विशेषज्ञों के मुताबिक, कोरोना के बाद वायु प्रदूषण भारत के सामने उभरता हुआ सबसे बड़ा सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट बनता जा रहा है। खासतौर पर भारतीय आबादी पर इसके दीर्घकालिक और गंभीर प्रभाव पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
सांस की बीमारियों की बड़ी लहर की चेतावनी
यूके में कार्यरत भारतीय मूल के वरिष्ठ श्वसन रोग विशेषज्ञों ने चेताया है कि बढ़ते वायु प्रदूषण के कारण आने वाले वर्षों में सांस की बीमारियों की एक बड़ी लहर देखने को मिल सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह संकट अभी पूरी तरह सामने नहीं आया है और न ही इसके लिए पर्याप्त इलाज या रोकथाम की व्यवस्था तैयार है, जिससे भविष्य में स्वास्थ्य सेवाओं पर भारी दबाव पड़ सकता है।
डॉक्टरों ने कहा कि अगर प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए तुरंत और प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो यह समस्या हर साल और गंभीर होती जाएगी।
दिल की बीमारियों का भी बढ़ रहा खतरा
विशेषज्ञों की टीम ने बताया कि पिछले एक दशक में दिल की बीमारियों में वैश्विक स्तर पर बढ़ोतरी हुई है। इसके लिए केवल मोटापा जिम्मेदार नहीं है, बल्कि शहरी ट्रैफिक से निकलने वाले जहरीले धुएं और पीएम 2.5 जैसे प्रदूषक भी हृदय रोगों के खतरे को बढ़ा रहे हैं। ऑटोमोबाइल और विमान से होने वाला प्रदूषण भी दिल की सेहत पर नकारात्मक असर डाल रहा है।
भारत पहले से ही हृदय रोगों का भारी बोझ झेल रहा है। ऐसे में अगर सांस से जुड़ी बीमारियां भी तेजी से बढ़ीं, तो स्वास्थ्य प्रणाली पर गंभीर असर पड़ सकता है।
अस्पतालों में बढ़े सांस के मरीज
डॉक्टरों के अनुसार, इस साल दिसंबर में ही दिल्ली के अस्पतालों में सांस से जुड़ी समस्याओं वाले मरीजों की संख्या में 20 से 30 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई। इनमें बड़ी संख्या ऐसे मरीजों की है, जिन्हें पहली बार सांस की तकलीफ हुई है।
बड़े स्तर पर हस्तक्षेप की जरूरत
विशेषज्ञों ने कहा कि केवल प्रदूषण नियंत्रण के उपाय अब पर्याप्त नहीं हैं। भारत ने पहले टीबी जैसी बीमारियों के खिलाफ बड़े पैमाने पर पब्लिक हेल्थ इंटरवेंशन कर सफलता हासिल की है। अब सांस और हृदय रोगों के लिए भी उसी तरह की तेजी, निवेश और रणनीति की जरूरत है।
हालांकि सरकार का कहना है कि वायु प्रदूषण और मृत्यु दर के बीच सीधे संबंध को साबित करने वाला ठोस डेटा उपलब्ध नहीं है, लेकिन डॉक्टरों का मानना है कि जमीनी हकीकत इन खतरों की गंभीरता को साफ दिखा रही है।
