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    October 01, 2025

    मां और शिशु की सेहत पर असर डालता है हाई बीपी, प्रेग्नेंसी में ऐसे करें नियंत्रण

    गर्भावस्था हर महिला के जीवन का सबसे खूबसूरत लेकिन नाजुक दौर होता है। इस दौरान शरीर कई बदलावों से गुजरता है। इन्हीं में से एक है ब्लड प्रेशर का बढ़ना, जिसे जेस्टेशनल हाइपरटेंशन कहा जाता है। यदि इसके साथ यूरिन में प्रोटीन आने लगे, तो यह प्री-एक्लेमप्सिया जैसी गंभीर स्थिति का रूप ले सकता है। यही कारण है कि गर्भावस्था के दौरान ब्लड प्रेशर की नियमित जांच बेहद जरूरी है।

    मां के लिए क्या खतरे हैं?

    • अनियंत्रित हाई बीपी गर्भवती महिलाओं के लिए कई जटिलताएं पैदा कर सकता है:
    • प्री-एक्लेमप्सिया, जो लिवर और किडनी को नुकसान पहुंचा सकता है।
    • प्लेसेंटल एबॉर्शन, जिसमें प्लेसेंटा गर्भाशय से अलग हो जाता है।
    • दौरे (सीजर) पड़ना, जो मां और शिशु दोनों के लिए जानलेवा साबित हो सकता है।

    शिशु पर क्या असर पड़ता है?

    • मां का हाई बीपी शिशु की सेहत को भी प्रभावित करता है:
    • प्लेसेंटा तक रक्त प्रवाह कम हो जाता है।
    • शिशु को पर्याप्त ऑक्सीजन और पोषण नहीं मिल पाता।
    • बच्चे का विकास रुक सकता है और उसका जन्म वजन सामान्य से कम हो सकता है।
    • कई बार समय से पहले डिलीवरी करनी पड़ती है।

    किन लक्षणों को न करें नजरअंदाज?

    • गर्भावस्था के 20वें सप्ताह के बाद यदि हाई बीपी के साथ ये लक्षण दिखें तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें:
    • लगातार तेज सिरदर्द
    • धुंधली दृष्टि या आंखों के सामने धब्बे आना
    • पसलियों के नीचे ऊपरी पेट में दर्द
    • चेहरे और हाथों में अचानक सूजन
    • जी मिचलाना या उल्टी होना

    कैसे करें बचाव और प्रबंधन?

    • नियमित प्रसव पूर्व जांच (Prenatal Checkup) करवाएं।
    • डॉक्टर की सलाह पर नमक का सेवन सीमित करें।
    • संतुलित और पौष्टिक आहार लें।
    • हल्के व्यायाम और योग को दिनचर्या में शामिल करें।
    • पर्याप्त आराम करें और तनाव से बचें।
    • किसी भी दवा या डाइट परिवर्तन से पहले डॉक्टर से सलाह जरूर लें।

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