आज की तेज रफ्तार जिंदगी में मानसिक तनाव एक आम समस्या बन चुका है। इसका असर न सिर्फ हमारे दिमाग पर, बल्कि सीधे हमारे पाचन तंत्र पर पड़ता है। कई बार देखा जाता है कि किसी परीक्षा, प्रस्तुति या इंटरव्यू से पहले अचानक पेट में गड़बड़ी होने लगती है। इसका कारण है ‘गट-ब्रेन एक्सिस’—एक ऐसी जटिल प्रणाली जो दिमाग और पाचन तंत्र को आपस में जोड़ती है।
स्ट्रेस कैसे बिगाड़ता है पाचन?
लगातार तनाव की स्थिति में मस्तिष्क एड्रेनालाईन और कोर्टिसोल जैसे हार्मोन जारी करता है, जो शरीर को ‘फाइट ऑर फ्लाइट’ मोड में ले जाते हैं। इस दौरान शरीर पाचन प्रक्रिया को धीमा कर देता है और ब्लड फ्लो पेट से हटकर मांसपेशियों की ओर चला जाता है।
इसी वजह से भोजन देर से पचता है और कब्ज, गैस, बदहजमी और एसिडिटी जैसी समस्याएं शुरू हो जाती हैं।
पाचन क्रिया धीमी पड़ने का कारण
तनाव बढ़ने पर शरीर पाचन को प्राथमिकता नहीं देता। कोर्टिसोल के अधिक बनने पर आंतों की सामान्य गति धीमी हो जाती है, जिससे खाना पेट में लंबे समय तक पड़ा रहता है। यही कारण है कि व्यक्ति को
- बदहजमी
- पेट भारी लगना
- कब्ज
जैसी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।
एसिडिटी और जलन क्यों बढ़ती है?
मानसिक तनाव पेट में गैस्ट्रिक एसिड के उत्पादन को बढ़ा देता है। अतिरिक्त एसिड पेट की परत को नुकसान पहुंचाता है और सीने में जलन तथा एसिडिटी की शिकायतें बढ़ जाती हैं। लंबे समय तक ऐसा बने रहने पर अल्सर जैसी गंभीर समस्याओं का खतरा भी बढ़ जाता है।
आंतों की संवेदनशीलता बढ़ना
तनाव आंतों को ज्यादा संवेदनशील बना देता है। खासतौर पर IBS (इर्रिटेबल बॉवेल सिंड्रोम) वाले मरीजों में यह जल्दी दिखाई देता है। हल्का-सा तनाव भी
- पेट में ऐंठन,
- तेज दर्द,
- दस्त या कब्ज
को ट्रिगर कर सकता है।
माइक्रोबायोम पर असर
लगातार स्ट्रेस आंतों के अच्छे और बुरे बैक्टीरिया के संतुलन को बिगाड़ देता है। अच्छे बैक्टीरिया की कमी से पाचन कमजोर होता है, पोषक तत्व ठीक से अवशोषित नहीं होते और शरीर में सूजन बढ़ने लगती है। इसका असर मानसिक स्वास्थ्य पर भी पड़ता है।
समाधान क्यों जरूरी है?
विशेषज्ञ मानते हैं कि पाचन को सुधारने के लिए केवल खान-पान का ध्यान रखना काफी नहीं है। तनाव का सही प्रबंधन—जैसे पर्याप्त नींद, मेडिटेशन, हल्की एक्सरसाइज और संतुलित दिनचर्या—पेट की अधिकांश समस्याओं को कम कर सकता है।
