रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की केमिस्ट्री को दुनिया पहले ही देख चुकी है, लेकिन अब इस रिश्ते के असली रंग की परीक्षा होने वाली है। पुतिन की भारत यात्रा ने संकेत दे दिए हैं कि क्रेमलिन अब भारत की रणनीतिक भूमिका को और आगे बढ़ते हुए देखना चाहता है। रूस चाहता है कि भारत, चीन की तरह, उसकी रणनीतिक साझेदारी में और मजबूती से आगे आए। अब निगाहें हैदराबाद हाउस में होने वाली महत्वपूर्ण बैठकों पर हैं, जहां दोनों नेता द्विपक्षीय और वैश्विक मुद्दों पर गहन चर्चा करेंगे।
अमेरिका के दबाव के बीच रूस–भारत साझेदारी
इस दौरे पर दक्षिण एशिया, रूस, अमेरिका और यूरोप की नज़रें टिकी हैं। रूस की ओर से पहले दिमित्री पेस्कोव और फिर पुतिन ने यह साफ कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी किसी दबाव में निर्णय नहीं लेते। उनकी रणनीतिक सोच और टीम—NSA अजीत डोभाल, विदेश मंत्री एस. जयशंकर, विदेश सचिव विक्रम मिस्री—की कूटनीतिक तैयारी भी इसकी पुष्टि करती है।
रूस की मंशा साफ है—एशिया में चीन के साथ रणनीतिक साझेदारी मजबूत रखने के साथ दक्षिण एशिया में अमेरिकी प्रभाव को संतुलित करना। 1971 युद्ध से लेकर यूक्रेन संकट तक भारत और रूस के रिश्तों ने हमेशा कठिन दौर में एक-दूसरे का साथ दिया है। इसी कारण अमेरिका द्वारा लगाए जा रहे दबाव के बीच भी भारत ने रूस के साथ तेल आयात और रक्षा सहयोग जारी रखा।
वैश्विक भू-राजनीति में नया समीकरण
अंतरराष्ट्रीय राजनीति अब एक नए दौर में है, जहां रूस अपने “महाशक्ति” वाले प्रभाव को पुनर्स्थापित करने की कोशिश में है। उसका बड़ा प्रतिद्वंदी चीन है, जबकि अमेरिका चीन के प्रभाव को सीमित करना चाहता है। ऐसे में भारत का रूस के साथ खड़ा रहना, चीन को संतुलित रखने की रणनीति का हिस्सा भी माना जा रहा है।
पूर्व विदेश सचिव शशांक का मानना है कि “अमेरिका से बेहतर रूस की दोस्ती है”, लेकिन भारत को दोनों के बीच संतुलन बनाए रखना होगा, ताकि आर्थिक प्रतिबंधों जैसी स्थितियों से बचा जा सके।
पुतिन की ‘अटैची’ में बड़े प्रस्ताव
पुतिन इस यात्रा पर कई बड़े प्रस्ताव लेकर आए हैं। उनके साथ सात मंत्री और शीर्ष अधिकारी मौजूद हैं। रूस परमाणु ऊर्जा, तकनीक हस्तांतरण, रक्षा सौदे, अंतरिक्ष सहयोग, कृषि, हाइड्रोकार्बन, निवेश और मैनपावर सप्लाई तक—कई अहम समझौतों को आगे बढ़ाने के लिए तैयार है।
इसके साथ ही पुतिन डॉलर के दबदबे को चुनौती देने और BRICS को नई ऊर्जा देने की रणनीति भी साथ लाए हैं। यूरोप और जर्मनी के कदमों को देखते हुए रूस मध्य एशिया और एशिया में नया भू-राजनीतिक मोर्चा तैयार करना चाहता है।
अब दुनिया की नज़र इस बात पर है कि पुतिन की भारत यात्रा अंतरराष्ट्रीय मंच पर क्या संदेश देगी, और भारत कैसे अमेरिकी दबाव, रूस की अपेक्षाओं और चीन के बढ़ते प्रभाव के बीच कूटनीतिक संतुलन बनाए रखेगा।
