बॉम्बे उच्च न्यायालय ने एक महिला को अपने पांच साल के पोते की कस्टडी उसके माता-पिता को लौटाने का निर्देश दिया है। न्यायालय ने कहा है कि बच्चे के साथ उनका भावनात्मक रिश्ता भले ही हो, लेकिन उन्हें बच्चे की कस्टडी का अधिकार नहीं मिल सकता। बच्चे की दादी ने याचिका का विरोध करते हुए दावा किया कि वह जन्म से ही बच्चे की देखभाल कर रही हैं और उनके बीच भावनात्मक रिश्ता है।
पीठ ने भावनात्मक लगाव के आधार पर बच्चे की कस्टडी देने से इनकार किया
जस्टिस रवींद्र घुगे और जस्टिस गौतम अंखड की पीठ ने गुरुवार को कहा कि दादी का बच्चे के साथ भावनात्मक रिश्ता हो सकता है, लेकिन इस तरह का लगाव उसे बच्चे के जैविक माता-पिता की तुलना में कस्टडी का अधिकार नहीं देता। अदालत ने कहा कि बच्चे की कस्टडी पर जैविक माता-पिता के अधिकारों को तभी छीना जा सकता है जब यह साबित हो जाए कि उन्हें कस्टडी देना बच्चे के कल्याण के लिए नुकसानदायक होगा।
क्या है मामला
जिस बच्चे की कस्टडी का मामला है, वह बचपन से ही अपनी दादी के पास रह रहा था। बच्चे का एक जुड़वां भाई भी है, जो सेरेब्रल पल्सी बीमारी से पीड़ित है। माता-पिता ने सेरेब्रल पल्सी से पीड़ित बच्चे की देखभाल करने के लिए अपने दूसरे बेटे को दादी के पास छोड़ा था। हालांकि संपत्ति को लेकर हुए विवाद के चलते, बच्चे के पिता ने अपनी 74 वर्षीय मां से बच्चे की कस्टडी मांगी तो मां ने इनकार कर दिया। जिसके बाद बच्चे के पिता ने उच्च न्यायालय में अपील दायर की।
'दादी को पोते की कस्टडी रखने का अधिकार नहीं'
पीठ ने कहा कि बच्चे के माता-पिता के बीच कोई वैवाहिक कलह नहीं है और ऐसा कोई सबूत भी नहीं है, जिससे पता चले कि वे बच्चे की देखभाल करने में असमर्थ हैं। अदालत ने कहा कि बच्चे को केवल माता-पिता और दादी के बीच विवाद के कारण उसके माता-पिता की देखभाल से वंचित नहीं किया जा सकता। अदालत ने आगे कहा कि दादी को अपने पोते की कस्टडी में रखने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है, खासकर जब वह 74 वर्ष की हों।
अदालत ने दादी की इस दलील को मानने से इनकार कर दिया कि याचिकाकर्ता और उसकी पत्नी भावनात्मक और आर्थिक रूप से जुड़वा बच्चों की देखभाल करने में असमर्थ हैं। अदालत ने दादी को दो हफ्ते के भीतर बच्चे की कस्टडी बच्चे के माता-पिता को सौंपने का आदेश दिया।
