जयपुर के प्रसिद्ध जौहरी प्रकाशचंद संचेती, जिन्होंने जीवनभर रत्नों के अंतरराष्ट्रीय कारोबार से पहचान बनाई, गुरुवार रात राजस्थान के बालोतरा में देवलोकवासी हो गए। दीक्षा के बाद वे शालिभद्र मुनि के नाम से विख्यात हुए। शुक्रवार को उनकी डोल यात्रा निकाली गई, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं और अनुयायियों ने भाग लिया।
वैभवशाली जीवन छोड़ अपनाई साधना
प्रकाशचंद संचेती का जीवन ऐश्वर्य से भरा था—फाइव स्टार होटलों में रहना, विदेशी यात्राएं, 50 से अधिक देशों में कारोबार, महंगी गाड़ियों का काफिला और बड़ा बंगला। लोग कहते थे कि वे गर्मी लगने पर महीनों विदेश में रहते थे।
लेकिन 1994 में उनकी मां चंपादेवी के दो वाक्य—“कितना कमाना है बेटा? अब धर्म कर, साथ तो धर्म ही जाएगा”—ने उनका जीवन बदल दिया।
इसी प्रेरणा के बाद उन्होंने और उनकी पत्नी शशि ने वैभव का त्याग कर साथ में दीक्षा ली। पति शालिभद्र मुनि और पत्नी साध्वी शशिकला नाम से धर्ममार्ग पर आगे बढ़े।
कठोर तपस्या, कठिन संयम का जीवन
दीक्षा के बाद शालिभद्र मुनि ने कठोर तपस्याएं कीं—
- गर्मी में सूर्य की आतापना
- कड़ाके की सर्दी में बिना ऊपरी वस्त्र के तप
- लगातार संयम और साधना में लीन रहना
ज्ञानगच्छाधिपति तपस्वी चंपालाल महाराज के सानिध्य में उन्होंने कठिन व्रतों का पालन किया।
गुरु ने उन्हें चेताया था कि "आपने इतना वैभव देखा है, कठिन संयम आसान नहीं होगा",
लेकिन मुनि ने अपनी दृढ़ इच्छा से उन्हें विश्वास दिलाया और दीक्षा लेने का संकल्प निभाया।
जौहरी से मुनि बनने की अद्भुत यात्रा
- जन्म: 12 अक्टूबर 1947, अलवर
- पांच बहनों के इकलौते भाई
- जयपुर आकर रत्न व आभूषणों का कारोबार शुरू
- तेजी से भारत–विदेश में व्यापार का विस्तार
- सुबोध शिक्षा समिति के संयोजक; कॉलेज की प्रगति में महत्वपूर्ण योगदान
- 1969 में विवाह
- 1982 में मां के कहने पर जीवन अध्यात्म की ओर मुड़ा
- 1994 में जयपुर के लाल भवन में दीक्षा
अंतिम यात्रा में उमड़ा जनसैलाब
बालोतरा में उनकी अंतिम यात्रा में सैकड़ों श्रद्धालु, समाजजन और अनुयायी उमड़ पड़े। डोल यात्रा के दौरान पूरा नगर श्रद्धांजलि में डूब गया।
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