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    December 20, 2025

    नए अध्ययन में खुलासा: एआई से रिसर्च पेपर्स की भाषा हुई ज्यादा जटिल

    आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का इस्तेमाल रिसर्च पेपर लिखने में तेजी से बढ़ रहा है और इसका असर अब साफ दिखाई देने लगा है। एक नए अध्ययन में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि AI की मदद से रिसर्च पेपर्स की भाषा पहले से ज्यादा भारी-भरकम और जटिल हो गई है, लेकिन कई मामलों में रिसर्च की असल गुणवत्ता कमजोर पड़ रही है। यह अध्ययन प्रतिष्ठित जर्नल Science में प्रकाशित हुआ है।

    यह रिपोर्ट ऐसे समय सामने आई है, जब Springer Nature और Elsevier जैसे बड़े पब्लिशर्स रिसर्च लेखन में AI के इस्तेमाल की अनुमति दे रहे हैं और इसके लिए गाइडलाइंस भी तय कर रहे हैं।

    अध्ययन में क्या पाया गया?

    अमेरिका की कॉर्नेल यूनिवर्सिटी और कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने

    • 21 लाख से ज्यादा प्री-प्रिंट रिसर्च पेपर्स,
    • 28 हजार से अधिक पीयर-रिव्यू स्टडीज
    • और वैज्ञानिक दस्तावेजों के करीब 24.6 करोड़ ऑनलाइन व्यूज
      का विश्लेषण किया।

    शोधकर्ताओं ने यह समझने की कोशिश की कि बड़े भाषा मॉडल (LLM) जैसे ChatGPT और Gemini जैसे AI टूल्स का रिसर्च पर क्या असर पड़ा है।

    AI से बढ़ी प्रोडक्टिविटी, लेकिन…

    अध्ययन के मुताबिक, AI के इस्तेमाल से वैज्ञानिकों की प्रोडक्टिविटी 23% से 89% तक बढ़ सकती है। जिन शोधकर्ताओं को अंग्रेजी में लिखने में कठिनाई होती थी, उन्हें सबसे ज्यादा फायदा मिला। खासतौर पर एशियाई देशों के शोधकर्ताओं की प्रोडक्टिविटी में 43% से 89% तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई।

    हालांकि सबसे अहम निष्कर्ष यह रहा कि AI से लिखे गए कई पेपर्स की भाषा तो ज्यादा जटिल और प्रभावशाली लगती है, लेकिन तकनीकी और वैज्ञानिक स्तर पर वे कमजोर पाए गए। यानी कठिन भाषा कई बार कमजोर रिसर्च को छिपाने का जरिया बन रही है।

    संदर्भ और स्रोतों में भी बदलाव

    AI के कारण अब शोधकर्ता ज्यादा किताबों और कम-cite होने वाले लेखों का हवाला देने लगे हैं। करीब 12% शोधकर्ताओं ने पहले के मुकाबले ज्यादा किताबों को रेफर किया, जिससे यह साफ होता है कि AI लंबे और जटिल स्रोतों से जानकारी निकालने में सक्षम है।

    भविष्य की चुनौती

    शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि एडवांस AI सिस्टम भविष्य में रिसर्च की गुणवत्ता, वैज्ञानिक संवाद और बौद्धिक मेहनत की परिभाषा को चुनौती देंगे। आने वाले समय में भाषा की सुंदरता से ज्यादा जरूरी होगा मजबूत मूल्यांकन, सख्त पीयर-रिव्यू और गहरी जांच।

    वैज्ञानिक समुदाय, जर्नल एडिटर्स और रिव्यूअर्स को अब पहले से ज्यादा सतर्क रहना होगा, ताकि AI की चमकदार भाषा के पीछे छिपी कमजोर रिसर्च को समय रहते पहचाना जा सके।

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