भारत में डिजिटल पेमेंट को आसान बनाने वाला यूपीआई अब फ्रॉड के बढ़ते मामलों को लेकर चिंता का कारण बनता जा रहा है। संसद में पेश किए गए ताजा सरकारी आंकड़ों से खुलासा हुआ है कि यूपीआई के जरिए होने वाली ठगी ने बीते वर्षों में रिकॉर्ड स्तर छुआ, हालांकि अब इनमें धीरे-धीरे गिरावट दर्ज की जा रही है। इसके बावजूद ठगी के बाद पैसा वापस मिलने की बेहद कम दर ने नई चिंता खड़ी कर दी है।
वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने संसद में बताया कि मार्च 2024 को समाप्त वित्त वर्ष 2024 यूपीआई यूजर्स के लिए सबसे ज्यादा नुकसान वाला रहा। इस दौरान देशभर में करीब 13.42 लाख ऑनलाइन फ्रॉड के मामले दर्ज हुए, जिनमें आम लोगों से लगभग 1,087 करोड़ रुपये की ठगी हुई। यूपीआई के व्यापक उपयोग के बाद यह अब तक का सबसे बड़ा आंकड़ा माना जा रहा है।
हालांकि इसके बाद हालात में कुछ सुधार देखने को मिला है। वित्त वर्ष 2025 में यूपीआई फ्रॉड के मामले घटकर 12.64 लाख रह गए और ठगी की राशि भी कम होकर 981 करोड़ रुपये पर आ गई। चालू वित्त वर्ष 2026 में नवंबर तक सामने आए आंकड़ों के अनुसार, करीब 10.64 लाख मामले दर्ज हुए हैं, जिनमें फ्रॉड की रकम लगभग 805 करोड़ रुपये रही। इससे संकेत मिलता है कि सरकार और एजेंसियों की सख्ती का असर अब दिखने लगा है।
लेकिन सबसे बड़ी चिंता रिकवरी को लेकर है। सरकार ने बताया कि अप्रैल से सितंबर 2025 के बीच यूपीआई फ्रॉड से जुड़ी 92 प्रतिशत शिकायतों पर 30 दिनों के भीतर कार्रवाई की गई, बावजूद इसके ठगी की रकम की रिकवरी दर महज 6 प्रतिशत रही। यानी ज्यादातर मामलों में पैसा वापस मिलना बेहद मुश्किल साबित हो रहा है।
यूपीआई फ्रॉड पर लगाम लगाने के लिए आरबीआई और एनपीसीआई ने कई सख्त कदम उठाए हैं। आरबीआई एक डिजिटल इंटेलिजेंस प्लेटफॉर्म लाने की तैयारी में है, जिससे बैंकों और फिनटेक कंपनियों के बीच रियल-टाइम डेटा साझा किया जा सके। वहीं एनपीसीआई ने नए डिवाइस लॉग-इन नियम, ट्रांजैक्शन लिमिट, कूल-डाउन पीरियड और एआई आधारित निगरानी जैसे फीचर लागू किए हैं, ताकि संदिग्ध लेन-देन को समय रहते रोका जा सके।
सरकारी आंकड़े साफ संकेत दे रहे हैं कि भले ही यूपीआई फ्रॉड के मामलों में गिरावट आई हो, लेकिन ठगी के बाद पैसा वापस मिलना अब भी बड़ी चुनौती बना हुआ है। ऐसे में यूजर्स के लिए सतर्कता ही सबसे बड़ा बचाव है।
