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    May 28, 2026

    उर्दू अदब को बड़ा नुकसान, शायर बशीर बद्र ने दुनिया को कहा अलविदा

    मशहूर उर्दू शायर डॉ. बशीर बद्र का गुरुवार दोपहर भोपाल में निधन हो गया। वे 91 वर्ष के थे। लंबे समय से डिमेंशिया से जूझ रहे बशीर बद्र ने दोपहर 12:15 बजे अंतिम सांस ली। उन्हें शाम 7:30 बजे भोपाल टॉकीज के पास स्थित कब्रिस्तान में सुपुर्द-ए-खाक किया जाएगा।

    करीब 14 वर्षों से डिमेंशिया की बीमारी से पीड़ित बशीर बद्र की याददाश्त कमजोर हो गई थी, लेकिन मुशायरों की याद आते ही वे ‘इरशाद-इरशाद’ कहने लगते थे। उनकी पत्नी डॉ. राहत बद्र जब उनकी गजलें गुनगुनाती थीं, तो वे कई बार खुद भी मिसरे पूरे करने लगते थे।

    बशीर बद्र की शायरी में मोहब्बत, जिंदगी की सच्चाई, समाज का दर्द और इंसानी रिश्तों की गहराई साफ नजर आती थी। उनके कई शेर आज भी लोगों की जुबान पर हैं।
    “कुछ तो मजबूरियां रही होंगी, यूं कोई बेवफा नहीं होता” और
    “उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो, न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए”
    जैसे शेरों ने उन्हें देश-दुनिया में खास पहचान दिलाई।

    15 फरवरी 1935 को उत्तर प्रदेश के कानपुर में जन्मे बशीर बद्र ने कम उम्र में शायरी शुरू कर दी थी। वे अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के गोल्ड मेडलिस्ट रहे और बाद में उनके अशआर भी एमए के पाठ्यक्रम में शामिल किए गए। उन्होंने 500 से ज्यादा मुशायरों में शिरकत की और भारत के अलावा अमेरिका, पाकिस्तान और ब्रिटेन में भी अपनी शायरी से लोगों का दिल जीता।

    1987 के मेरठ दंगों में उनका घर जलाए जाने की घटना ने उनकी जिंदगी बदल दी थी। इसके बाद उन्होंने भोपाल को अपना ठिकाना बना लिया। इस दर्द को उन्होंने अपने मशहूर शेर में बयान किया था—
    “लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में, तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में।”

    बशीर बद्र ने उर्दू गजल को आसान भाषा और नए अंदाज में पेश किया। उनकी शायरी में दर्द, मोहब्बत और जिंदगी की सच्चाई का अनोखा मेल देखने को मिलता है। उर्दू अदब में उनके योगदान को हमेशा याद रखा जाएगा।

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