ऑफिस में घुसा शूटर, 2 गोलियां मारकर फरार: वकील की हत्या से दहला राजस्थान, 14 साल बाद खुला राज (पार्ट-1)
6 जनवरी 2007 की शाम प्रतापगढ़ शहर के लिए एक ऐसी घटना लेकर आई, जिसने पूरे जिले को हिला दिया। कोतवाली क्षेत्र में चर्चित अधिवक्ता गिरिराज जोशी अपने कार्यालय में बैठे थे। उनके साथ कुछ अन्य लोग भी मौजूद थे। शाम करीब 6:45 बजे एक युवक ऑफिस में दाखिल हुआ और सीधे गिरिराज जोशी की ओर बढ़ा।
इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता, हमलावर ने पिस्तौल निकालकर फायरिंग कर दी। पहली गोली गिरिराज जोशी की पसली में लगी, जबकि दूसरी कनपटी में जा लगी। गोली लगते ही वे कुर्सी से नीचे गिर पड़े और मौके पर ही उनकी मौत हो गई। वारदात को अंजाम देने के बाद आरोपी बाहर खड़ी बाइक पर सवार अपने साथी के साथ फरार हो गया।
घटना की सूचना मिलते ही इलाके में हड़कंप मच गया। कोतवाली पुलिस मौके पर पहुंची और हत्या का मामला दर्ज कर जांच शुरू की। शुरुआती जांच में पुलिस को पेशेवर रंजिश का शक हुआ, क्योंकि गिरिराज जोशी शहर के चर्चित अधिवक्ता थे और कई महत्वपूर्ण मामलों की पैरवी कर चुके थे।
जांच आगे बढ़ने पर पुलिस को पता चला कि गिरिराज जोशी एक विवादित जमीन मामले में सक्रिय भूमिका निभा रहे थे। धार्मिक स्थल के पास स्थित करीब 10 बीघा जमीन को लेकर लंबे समय से विवाद और समझौते की कोशिशें चल रही थीं। जमीन की बढ़ती कीमत और उससे जुड़े हितों ने इस मामले को और संवेदनशील बना दिया था।
पुलिस ने कॉल रिकॉर्ड खंगाले, कई लोगों से पूछताछ की और संदिग्ध गतिविधियों की जांच शुरू की। इसी दौरान कुछ लोगों की संदिग्ध बैठकों और लेन-देन की जानकारी सामने आई। जांच के दौरान भाउद्दीन उर्फ बाउद्दीन, वसीम खान, अमीन खान, शाकिर बोहरा, चुन्नू उर्फ इमरान और मुस्तफा समेत कई नाम जांच के दायरे में आए।
पुलिस को शक था कि यह कोई साधारण हत्या नहीं, बल्कि पूरी योजना के तहत अंजाम दिया गया कॉन्ट्रैक्ट मर्डर था। जांच में यह भी सामने आया कि हत्या से पहले समझौते के प्रयास हुए थे और एक बैठक में 25 लाख रुपए तथा एक बीघा जमीन देने की बात भी सामने आई थी। इसके बावजूद विवाद सुलझ नहीं सका और मामला खून-खराबे तक पहुंच गया।
मृतक के परिजनों ने आरोप लगाया कि हत्या के पीछे प्रभावशाली लोग शामिल हैं और सच को दबाने की कोशिश की जा रही है। मामले ने राजनीतिक और सामाजिक रंग भी ले लिया। अधिवक्ताओं ने विरोध प्रदर्शन किए और निष्पक्ष जांच की मांग उठाई।
जांच के दौरान पुलिस ने 183 दस्तावेज जुटाए और 102 गवाहों के बयान दर्ज किए। मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट के निर्देश पर ट्रायल प्रतापगढ़ से चित्तौड़गढ़ जिला एवं सत्र न्यायालय में स्थानांतरित कर दिया गया।
करीब 14 साल तक चली सुनवाई के बाद 1 अक्टूबर 2021 को अदालत ने फैसला सुनाते हुए 8 आरोपियों को दोषी करार दिया। हालांकि इस साजिश का मास्टरमाइंड कौन था और जमीन विवाद ने हत्या की साजिश का रूप कैसे लिया, इसकी पूरी कहानी अगले भाग में सामने आएगी।
